शनिवार, 24 जनवरी 2009

आज बह जाने दो..मुझे न रोको !

कैसी है ये लहरे...जो रह रह के उमड़ रही है....

भावनाओ में बह के बहार आने को तड़प रही है..

न मिला गर इन्हे शब्दों का स्वरुप तो....

आँखों से बह निकलेगी...रोकू गर उन्हें

तो जुबा कह उठेगी...

बह जाने दो मुझे आज....न रोको...



रूप न देखो मेरा...बस आज बह जाने दो...