शनिवार, 24 जनवरी 2009

आज बह जाने दो..मुझे न रोको !

कैसी है ये लहरे...जो रह रह के उमड़ रही है....

भावनाओ में बह के बहार आने को तड़प रही है..

न मिला गर इन्हे शब्दों का स्वरुप तो....

आँखों से बह निकलेगी...रोकू गर उन्हें

तो जुबा कह उठेगी...

बह जाने दो मुझे आज....न रोको...



रूप न देखो मेरा...बस आज बह जाने दो...

5 टिप्‍पणियां:

  1. bouth he aacha post kiyaa yaar


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  2. Bahut kam shabdon men man ke bhavon ko abhivyakt kiya hai apne .age bhee likhiye.shubhkamnayen.
    Poonam

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  3. कैसी है ये लहरे...जो रह रह के उमड़ रही है....

    भावनाओ में बह के बहार आने को तड़प रही है..

    न मिला गर इन्हे शब्दों का स्वरुप तो....

    आँखों से बह निकलेगी...रोकू गर उन्हें

    तो जुबा कह उठेगी...

    बह जाने दो मुझे आज....न रोको...

    bhot khoob.....!

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  4. कैसी हैं ये लहरें..जो रह रह के उमड़ रही हैं.....
    भावनाओं में बह कर बाहर आने को तड़प रही हैं...

    एहसास की शिद्दत का बड़े सलीके से इज़हार करती हुई
    एक मासूम नज़्म ....
    बह जाने, और न बह पाने की अजब कशमकश .....
    बहुत अच्छी कृति . . . . . .
    अभिवादन स्वीकारें . . . . .
    ---मुफलिस---

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